बिलासपुर

हाईकोर्ट की सरकार को दो टूक, रिट अपील खारिज

High Court's blunt message to the government; writ appeal dismissed.

बिलासपुर। हाई कोर्ट ने जेल विभाग से जुड़े एक सेवा विवाद में राज्य सरकार द्वारा 86 दिन की देरी से दायर की गई रिट अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सरकारी विभागों को भी अन्य पक्षकारों की तरह समय-सीमा का पालन करना होगा और केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं या फाइलों के आवागमन को देरी माफ करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला राज्य शासन, जेल एवं सुधारात्मक सेवा महानिदेशक रायपुर तथा केंद्रीय जेल जगदलपुर अधीक्षक द्वारा दायर रिट अपील पर सुनाया।

मामले में मुंगेली जिला जेल में पदस्थ जेल वार्डर संजय कुमार साहू (35 वर्ष), पिता पूरन लाल साहू के पक्ष में 21 नवंबर 2025 को एकलपीठ ने आदेश पारित किया था। उस आदेश को चुनौती देने के लिए गृह विभाग ने रिट अपील दायर की, लेकिन यह निर्धारित 45 दिन की सीमा से 86 दिन विलंब से प्रस्तुत की गई।

राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि आदेश प्राप्त होने के बाद फाइल जेल मुख्यालय, गृह विभाग, महाधिवक्ता कार्यालय और विधि विभाग के बीच विचाराधीन रही। कानूनी राय लेने, अनुमति प्राप्त करने तथा अधिकारी-प्रभारी नियुक्त करने जैसी प्रक्रियाओं में समय लगने के कारण अपील विलंब से दायर हुई।

खंडपीठ ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि सरकारी विभागों को देरी माफी का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। प्रशासनिक या नौकरशाही प्रक्रियाएं अपने-आप में “पर्याप्त कारण” नहीं मानी जा सकतीं। अदालत ने पाया कि राज्य ने ऐसा कोई असाधारण या अपरिहार्य कारण नहीं बताया, जिससे समय-सीमा के भीतर अपील दायर करना संभव न हो।

देरी व लाचेस के आधार पर याचिका खारिज

कोर्ट ने कहा कि आवेदन में केवल विभागीय पत्राचार और फाइलों की आवाजाही का उल्लेख है, जबकि यह नहीं दिखाया गया कि निर्धारित अवधि के भीतर त्वरित और गंभीर प्रयास किए गए थे। इसलिए 86 दिन की देरी को माफ करने का कोई आधार नहीं बनता।इसी के साथ हाई कोर्ट ने देरी माफी आवेदन खारिज कर दिया और परिणामस्वरूप राज्य सरकार की रिट अपील भी देरी एवं लाचेस के आधार पर बिना गुण-दोष पर विचार किए खारिज कर दी।

Back to top button