छत्तीसगढ़ (सबसे ज़रूरी)

आपातकाल ने छीनी वीरेंद्र दीपक की शादी, बेटे ने साझा की मार्मिक कहानी

The Emergency cost Virendra Deepak his wedding; his son shares the poignant story.

छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रवक्ता उज्जवल दीपक के पिता वीरेंद्र दीपक पत्रकार रहे। उससे पहले लोकतंत्र सेनानी भी। इमरमेंसी में उन्हें 19 महीने जेल में रहना पड़ा था। जेल जाने की वजह से उनकी शादी टूट गई थी। आपातकाल दिवस पर नीचे पढ़िये उज्जवल की अनएडिटेड पोस्ट..

जब नानाजी ने तोड़ दिया था हमारे माता-पिता का रिश्ता…

इस तस्वीर को ध्यान से देखिए।

यह मई 1977 की तस्वीर है, जब रायपुर (छत्तीसगढ़) के केंद्रीय जेल से मीसा के तहत 19 महीने तक बंदी रहे लोकतंत्र सेनानियों को रिहा किया गया था। आपातकाल की अमानवीय यातनाएँ सहने के बाद जेल से बाहर निकलते इन चेहरों पर लोकतंत्र की जीत की मुस्कान साफ़ दिखाई देती है।

इस तस्वीर में जनसंघ के अनेक वरिष्ठ नेता उपस्थित हैं, जिनमें स्वर्गीय बाबू पंडरी राव कृदत्त जी, स्वर्गीय पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा जी, स्वर्गीय शारदा प्रसाद शर्मा जी, स्वर्गीय सोम प्रकाश गिरी जी, स्वर्गीय जयंतीलाल गांधी जी, स्वर्गीय विट्ठल राव म्हस्के जी (दीपक म्हस्के जी के पिताजी) और हमारे पिताजी स्वर्गीय वीरेंद्र दीपक जी प्रमुख रूप से दिखाई दे रहे हैं।

इस तस्वीर के पीछे हमारे परिवार की एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसे याद करते हुए आज भी मन भावुक हो जाता है।

साल 1975 में हमारे पिताजी और माताजी का रिश्ता तय हो चुका था। नानाजी एक सरकारी शिक्षक थे और माताजी उस समय कॉलेज में अध्ययन कर रही थीं। पिताजी महासमुंद-राजिम क्षेत्र में छात्र आंदोलनों से जुड़े हुए थे और पत्रकारिता के माध्यम से भी जनजागरण का कार्य कर रहे थे।

नानाजी ने पंडित सुंदरलाल शर्मा जी के प्रतिष्ठित परिवार को देखकर यह रिश्ता सहर्ष स्वीकार किया था। विवाह की तैयारियाँ प्रारंभ होने ही वाली थीं कि 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया। संविधान की आत्मा को कुचल दिया गया और लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार हुआ।

देशभक्त और निर्भीक स्वभाव के कारण पिताजी भी लोकतंत्र की रक्षा के आंदोलन में कूद पड़े। उनके आंदोलन, उनके विचार और उनकी लेखनी सरकार को असहज करने लगी। परिणामस्वरूप 25 अक्टूबर 1975 को मात्र 26 वर्ष की आयु में उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

घरवालों को गिरफ्तारी की सूचना बाद में मिली। कुछ समय बाद नानाजी को भी इस घटना का पता चला। एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार के सरकारी शिक्षक के लिए यह अत्यंत कठिन परिस्थिति थी। होने वाला दामाद जेल में था, लेकिन उसका अपराध क्या था, यह किसी को स्पष्ट नहीं था। अनिश्चितता और चिंता के बीच आखिरकार परिवार ने निर्णय लिया कि अब यह विवाह नहीं होगा।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

संत कवि पवन दीवान जी, जिन्हें माताजी मामा कहती थीं, इस कठिन समय में हमारे परिवार के लिए सेतु बने। एक दिन राजिम में उनकी नानाजी से मुलाकात हुई। उन्होंने नानाजी को समझाया कि यह कोई अपराधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाला एक युवा क्रांतिकारी है। उन्होंने बताया कि पूरे देश में एक लाख से अधिक लोग केवल लोकतंत्र बचाने के अपराध में जेल भेजे गए हैं और अनेक बड़े राष्ट्रीय नेता भी उसी संघर्ष का हिस्सा हैं।

यह सुनकर नानाजी की सोच बदल गई। होने वाले दामाद के प्रति सम्मान और गर्व दोनों बढ़ गए। उन्होंने रिश्ता दोबारा कायम रखा और पिताजी के जेल से रिहा होने के बाद 11 दिसंबर 1977 को पूरे हर्षाेल्लास के साथ दोनों का विवाह संपन्न कराया।

नानाजी की खुशी उस समय और भी बढ़ गई, जब पिताजी ने स्पष्ट शब्दों में दहेज लेने से इनकार कर दिया। विवाह में उन्होंने केवल एक रुपये का शगुन स्वीकार किया। ऐसे स्वाभिमानी और सिद्धांतवादी दामाद को पाकर नानाजी जीवनभर गर्व महसूस करते रहे।

सन् 2001 में पिताजी के निधन के बाद भी नानाजी हमें उनके संघर्ष, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की कहानियाँ सुनाकर प्रेरित करते रहे।

आपातकाल केवल लोकतंत्र की हत्या नहीं था। यह लाखों परिवारों के सपनों, रिश्तों और जीवन पर लगा गहरा घाव था। मीसा बंदियों और उनके परिवारों ने जो पीड़ा, अपमान और अन्याय सहा, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है।

विडंबना यह है कि आज संविधान की रक्षा की बात करने वाली कांग्रेस ने ही उस समय संविधान की आत्मा का सबसे बड़ा गला घोंटा था। सविधान हत्या दिवस की 51वीं बरसी पर लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोकतंत्र सेनानियों को विनम्र श्रद्धांजलि।

अपने पूज्य पिताजी, स्वर्गीय वीरेंद्र दीपक जी को शत-शत नमन।

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